गोरखपुर। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय का दर्शनशास्त्र विभाग, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद एशियाई अध्ययन संस्थान, कोलकाता (संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार) के सहयोग से “बृहत्तर भारत: एशियाई देशों को जोड़ना” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन करने जा रहा है। यह आयोजन 25 और 26 मई, 2026 को विश्वविद्यालय परिसर में संपन्न होगा। इस संगोष्ठी के संयोजक दर्शनशास्त्र विभाग के समन्वयक डॉ. संजय कुमार राम हैं, और सह-संयोजक अंग्रेजी विभाग के डॉ. संजीव कुमार विश्वकर्मा हैं।
यह संगोष्ठी बृहत्तर भारत के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक आयामों की पड़ताल करने का प्रयास करती है, जो औपनिवेशिक इतिहास लेखन से परे जाकर एशिया में भारतीय विचार के जैविक प्रसार का अन्वेषण करती है। इसका मुख्य तर्क यह है कि वैदिक, बौद्ध और जैन दर्शन के संश्लेषण ने एक ऐसा सभ्यतागत ढांचा प्रदान किया जिसने पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया को आपस में जोड़ा। संस्कृत शिलालेखों, अंकोरवाट जैसे स्थापत्य चमत्कारों और विभिन्न एशियाई संस्करणों में रामायण के विकास का परीक्षण करके, संगोष्ठी एक बहुराष्ट्रीय आध्यात्मिक भूगोल को रेखांकित करना चाहती है।
इसके अतिरिक्त, चर्चाएं समकालीन दार्शनिक, धार्मिक, सौंदर्यशास्त्रीय एवं सांस्कृतिक विमर्श पर केंद्रित होंगी, जो यह प्रतिपादित करती हैं कि अंतर्संबंधों का प्राचीन लोकाचार आधुनिक भू-राजनीतिक सहयोग के लिए एक स्थायी मॉडल प्रदान करता है। तर्क यह है कि बृहत्तर भारत विजय का साम्राज्य नहीं, बल्कि साझा सौंदर्यशास्त्र, भाषाई जड़ों और नैतिक मूल्यों पर निर्मित एक ‘सांस्कृतिक राष्ट्रमंडल’ था। यह संगोष्ठी विद्वानों को यह प्रतिबिंबित करने के लिए एक मंच प्रदान करेगी कि कैसे ये ऐतिहासिक जुड़ाव वर्तमान अंतर-एशियाई संबंधों और क्षेत्रीय स्थिरता को सुदृढ़ कर सकते हैं।
उक्त जानकारी डॉ. संजय कुमार राम समन्वयक, दर्शनशास्त्र विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय ने दी।

