(सभी स्त्री को समर्पित कविता)
कभी भगिनी हूं, कभी भार्या हूं,
कभी तनुजा, माता, आर्या हूं,
मैं स्त्री हूं मुश्किल पथ की साथी,
पग-पग पर साथ निभाती हूं।
मै स्त्री हूं करुणा, ममता सहृदय लिए,
समझो तो मुस्कान भरी बगिया,
ना समझो तो नयनों में छिपी निर्मल अश्रु जलधार हूं मैं।।
मैं स्त्री हूं अद्भुत साहस से भरी,
विपदा में डूबते नाव को अपने हाथों से खेया है,
पर जब-जब तट तक मैं पहुंची,
लोगों ने आलोचना के उपहार दिए।
परवाह नहीं मुझे इन शूलों की,
मैंने तो धैर्य से पतवार चलाई है,
कभी भगिनी बनकर, कभी भार्या बनकर,
कभी तनुजा, माता, आर्या बनकर,
पग-पग पर साथ निभाती हूं।
मैं स्त्री हूं बाहर से कोमल,
भीतर से मौन शिखर हूं मैं,
अपनी आंचल में स्नेह,
प्रेम लिए हर युग में मान बढ़ाया है।

(पियाली “राहुल स्वर्णकार”)

